रमज़ान की जंग से पहले की दुनिया, उसके बाद की दुनिया से पूरी तरह अलग है

 हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन हुसैनी कोहसारी ने रमज़ान की जंग के बाद होने वाले बदलावों की ओर संकेत करते हुए कहा: इस घटना के बाद दुनिया एक अलग चरण में प्रवेश कर चुकी है, और ऐसी स्थितियों में हौज़ात ए इल्मिया को चाहिए कि वे एक सामरिक समीक्षा के बाद, क्षेत्र के नए बदलावों और उभरती हुई वैश्विक व्यवस्था के अनुरूप अपनी भूमिका और जिम्मेदारियों को पुनः निर्धारित करें।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के हौज़ा ए इल्मिया के अंतर्राष्ट्रीय मामलों के प्रमुख हुज्जतुल-इस्लाम सय्यद मुफ़ीद हुसैनी कोहसारी ने हौज़ा ए इल्मिया के शिक्षकों और शोधकर्ताओं की उपस्थिति में "मोअस्सेसा बैनुल्मिलाली वा मरकज़े तखस्सुसी हौज़वी जबलुस्सब्र" में आयोजित "रमज़ान की जंग के बाद क्षेत्र में बदलाव और भविष्य का परिदृश्य" विषयक एक विशेषज्ञ बैठक में रमज़ान की जंग के बाद क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बदलावों की विस्तृत जानकारी दी।

उन्होंने शुरुआत में हज़रत इमाम अली रज़ा (अ) के जन्मदिन की मुबारकबाद और शहीद मुर्तज़ा मुताहरी (र) की शहादत व शिक्षक दिवस पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए नए क्षेत्रीय परिवेश को स्पष्ट करते हुए कहा: रमज़ान की जंग से पहले की दुनिया, उसके बाद की दुनिया से पूरी तरह भिन्न है।

हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन हुसैनी कोहसारी ने कहा: युद्ध अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन हम युद्ध के बाद के चरण में प्रवेश कर चुके हैं। यह नया दौर एक अलग प्रकृति रखता है और आज क्षेत्रीय व्यवस्था के कुछ हिस्से पूरी तरह अस्तित्व में आ चुके हैं, जबकि शेष हिस्से भविष्य में घटित होंगे।

उन्होंने कहा: रमज़ान की जंग ने हर पहलू में बदलाव पैदा कर दिया है। आज अमेरिका क्षेत्र से बाहर निकाले जाने की राह पर है, ज़ायोनी तंत्र (इज़राइल) पतन की ओर बढ़ रहा है, एकध्रुवीय व्यवस्था टूट रही है, और पश्चिमी सभ्यता नैतिक और प्रतिष्ठा (विश्वसनीयता) के संकट का शिकार है।

हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन हुसैनी कोहसारी ने कहा: फारस की खाड़ी के देशों ने पुरानी व्यवस्था — जो अमेरिका से सुरक्षा निर्भरता और क्षेत्रीय गठबंधनों पर आधारित थी — से गुज़रते हुए एक नए चरण में प्रवेश कर लिया है।

उन्होंने इन बदलावों के कारकों के परिणामों की ओर संकेत करते हुए कहा: पश्चिमी अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की कमज़ोरी का प्रमाण इस युद्ध में अमेरिका के साथ चलने की भारी कीमतें और पर्यटन, वित्तीय तथा पारगमन अर्थव्यवस्था को हुआ गंभीर नुकसान — ये सब इन बदलावों के कारकों के परिणाम हैं।

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